भोपाल। खंडवा में जन्मे एक इंजीनियर ने जब तकनीक को आम लोगों तक पहुंचाने का सपना देखा, तब कंप्यूटर आज की तरह हर हाथ में नहीं था। इसी सोच ने संतोष चौबे को इंजीनियरिंग से शिक्षा और विज्ञान संचार की ओर मोड़ा। आगे चलकर यही यात्रा उन्हें साहित्य, हिंदी और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच तक ले गई। सोमवार को बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय, गढ़वा के प्रथम दीक्षांत समारोह में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान उनकी किसी एक उपलब्धि के लिए नहीं है। विश्वविद्यालय ने शिक्षा, विज्ञान संचार, सामाजिक उद्यमिता, साहित्य और रचनात्मक लेखन में उनके योगदान को इसके आधार के रूप में रेखांकित किया है।

प्रशासनिक सेवाओं की पृष्ठभूमि से अपनी पेशेवर यात्रा की शुरू

22 सितंबर 1955 को खंडवा में जन्मे संतोष चौबे ने इंजीनियरिंग और प्रशासनिक सेवाओं की पृष्ठभूमि से अपनी पेशेवर यात्रा शुरू की। भारतीय इंजीनियरिंग सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित होने के बाद भी उनका काम केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 1985 में उन्होंने ऑल इंडिया सोसायटी फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (AISECT) की स्थापना की।

उस समय कंप्यूटर तकनीक आम भारतीय समाज से काफी दूर थी। चौबे ने तकनीक को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की दिशा में काम शुरू किया। उनकी पुस्तक ‘कम्प्यूटर : एक परिचय’ ने हिंदी में कंप्यूटर को समझने की राह आसान की। इसके साथ उन्होंने देश के दूरदराज इलाकों में विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए कला और विज्ञान जत्थों का नेतृत्व किया।

लेकिन चौबे की पहचान केवल विज्ञान संचारक की नहीं बनी। उन्होंने साहित्य को भी अपनी रचनात्मक यात्रा का समानांतर रास्ता बनाया। कवि, कथाकार और उपन्यासकार के रूप में उनके सात कथा संग्रह, चार उपन्यास और चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं।

‘जल तरंग’ के लिए अंतरराष्ट्रीय वैली ऑफ वर्ड्स पुरस्कार मिला

उनके उपन्यासों में ‘राग केदार’, ‘क्या पता कामरेड मोहन’, ‘जल तरंग’ और ‘सपनों की दुनिया में ब्लैक होल’ शामिल हैं। ‘जल तरंग’ के लिए उन्हें शैलेश मटियानी और अंतरराष्ट्रीय वैली ऑफ वर्ड्स पुरस्कार मिला।

उनकी साहित्यिक सक्रियता लेखन से आगे संपादन तक जाती है। ‘कथा मध्य प्रदेश’, ‘कथा देश’, ‘कथा भोपाल’ और ‘विज्ञान कथा कोश’ जैसी परियोजनाओं के जरिए उन्होंने हिंदी के बड़े रचनात्मक संसार को दस्तावेज के रूप में सामने रखा।

इसी यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव ‘विश्व रंग’ है। वर्ष 2019 में भोपाल से शुरू हुआ यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच देने की कोशिश के रूप में आगे बढ़ा। इसके साथ अब 70 से अधिक देशों के जुड़ने की जानकारी दी गई है।

संतोष चौबे को भारत और विदेशों में साहित्य, हिंदी और सांस्कृतिक योगदान के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं। इनमें विश्व हिंदी शिखर सम्मान, भारत गौरव सम्मान, वातायन यूके अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मान, लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड और मैक्समूलर अंतरराष्ट्रीय अलंकरण प्रमुख हैं।

सात दशकों से अधिक के सफर में एक और उपलब्धि दर्ज

मानद डॉक्टरेट उनके लिए सम्मान की एक नई उपाधि जरूर है, लेकिन उनकी यात्रा की कहानी इससे कहीं लंबी है। तकनीक को हिंदी में समझाने से शुरू हुई यह यात्रा साहित्य तक पहुंची और फिर हिंदी को दुनिया तक ले जाने के प्रयास में बदल गई। मंगलवार को जब वे अपना 71वां जन्मदिन मनाएंगे, तब उनके जीवन के सात दशकों से अधिक का यह सफर एक और उपलब्धि के साथ दर्ज होगा।

By Rahul Singh

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